“भारतीय एमएसएमई सेक्टर महंगे कच्चे माल, फाइनेंस की कमी और सरकारी खरीद में देरी से पेमेंट की समस्या से जूझ रहा है, जहां 7.3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि फंसी हुई है। बजट 2026 में कस्टम ड्यूटी में कटौती, क्रेडिट गारंटी स्कीम्स का विस्तार और 45 दिन की पेमेंट मैंडेट का सख्त अमल जरूरी है, अन्यथा उत्पादन चक्र प्रभावित होकर रोजगार पर असर पड़ेगा। सेक्टर की प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए कन्वर्जेंस ऑफ स्कीम्स और लॉजिस्टिक्स कॉस्ट कम करने पर फोकस चाहिए।”
भारतीय एमएसएमई सेक्टर, जो देश की जीडीपी में करीब 30 प्रतिशत योगदान देता है और 11 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार प्रदान करता है, कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। मुख्य रूप से कच्चे माल की ऊंची कीमतें, फाइनेंस की सीमित पहुंच और सरकारी खरीद में पेमेंट की देरी इस सेक्टर की ग्रोथ को बाधित कर रही हैं। हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एमएसएमई की कुल क्रेडिट गैप 20-25 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है, जिसमें से औसतन 40 प्रतिशत ही फॉर्मल बैंकिंग से मिल पाता है। बाकी अनौपचारिक स्रोतों से 24-30 प्रतिशत ब्याज दर पर उधार लेना पड़ता है, जो व्यवसाय की लागत बढ़ाता है।
कच्चे माल की समस्या पर गौर करें तो, टेक्सटाइल, प्लास्टिक, ऑटोमोटिव और पैकेजिंग जैसे इंडस्ट्रीज में इंपोर्टेड इनपुट्स पर हाई कस्टम ड्यूटी के कारण लागत 15-20 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए, सिंथेटिक फाइबर्स और पॉलिमर्स पर इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर की वजह से डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग महंगी हो जाती है, जिससे एमएसएमई ग्लोबल कॉम्पिटिशन में पिछड़ जाते हैं। सरकारी स्तर पर क्रिटिकल रॉ मटेरियल्स पर ड्यूटी वेवर या सब्सिडी की मांग बढ़ रही है, ताकि लोकलाइजेशन को बढ़ावा मिले और एक्सपोर्ट बढ़ सके।
फाइनेंस की उपलब्धता के मामले में, एमएसएमई को कोलेटरल-फ्री लोन की कमी खल रही है। क्रेडिट गारंटी स्कीम्स जैसे CGTMSE के तहत लोन गारंटी दी जाती है, लेकिन इसका कवरेज सीमित है। हाल में, एमएसएमई क्रेडिट ग्रोथ 13 प्रतिशत YoY दर्ज की गई है, लेकिन लार्ज एंटरप्राइजेज के मुकाबले यह कम है। बजट 2026 में एमएसएमई के लिए डेडिकेटेड रिन्यूएबल एनर्जी फंड या स्टार्टअप इंडिया के तहत नॉन-रेटेड कंपनियों के लिए स्पेशल बजट लाइन की उम्मीद है। साथ ही, इंटरेस्ट सबवेंशन स्कीम्स को 2.75 प्रतिशत तक बढ़ाने से कर्ज की लागत कम हो सकती है।
सरकारी खरीद में पेमेंट सुधार की बात करें तो, पब्लिक प्रोक्योरमेंट पॉलिसी फॉर MSEs के तहत सेंट्रल गवर्नमेंट डिपार्टमेंट्स और PSUs को अपनी कुल वार्षिक खरीद का कम से कम 25 प्रतिशत MSEs से करना अनिवार्य है। लेकिन समस्या पेमेंट साइकल में है – मैंडेटेड 45 दिन के बजाय औसतन 120 दिन लग जाते हैं। इससे एमएसएमई की वर्किंग कैपिटल स्ट्रेस्ड हो जाती है, और वे हाई इंटरेस्ट पर उधार लेने को मजबूर होते हैं। समाधान पोर्टल पर 10.7 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की क्लेम्स पेंडिंग हैं, जो सेक्टर की लिक्विडिटी क्रंच को दर्शाता है।
एमएसएमई की इन चुनौतियों को दूर करने के लिए कन्वर्जेंस ऑफ स्कीम्स जरूरी है। विभिन्न मिनिस्ट्रीज के स्कीम्स में ओवरलैपिंग ऑब्जेक्टिव्स के कारण इफिशिएंसी कम हो जाती है। उदाहरण के लिए, मार्केटिंग असिस्टेंस स्कीम्स में रॉ मटेरियल पर 35 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है, लेकिन इसका इम्प्लिमेंटेशन फ्रैगमेंटेड है। बजट 2026 में इंफ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट, लॉजिस्टिक्स कॉस्ट रिडक्शन और पेमेंट डिसिप्लिन को प्राथमिकता देने से सेक्टर की कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ सकती है।
एमएसएमई चुनौतियों का डेटा ओवरव्यू
| पैरामीटर | वर्तमान स्थिति | प्रभाव |
|---|---|---|
| क्रेडिट गैप | 20-25 लाख करोड़ रुपये | फॉर्मल क्रेडिट केवल 40% उपलब्ध, बाकी हाई इंटरेस्ट पर |
| डिले पेमेंट्स | 7.3 लाख करोड़ रुपये फंसे | वर्किंग कैपिटल प्रभावित, उत्पादन चक्र बाधित |
| रॉ मटेरियल कॉस्ट | 15-20% बढ़ोतरी ड्यूटी से | मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी रिस्ट्रिक्टेड |
| पेमेंट साइकल | औसतन 120 दिन (45 दिन मैंडेटेड) | रोजगार और ग्रोथ पर असर |
| क्रेडिट ग्रोथ | 13% YoY | लार्ज एंटरप्राइजेज से कम (6.1%) |
कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए, गवर्नमेंट को क्रिटिकल इनपुट्स पर ड्यूटी रैशनलाइजेशन करना चाहिए। जैसे, रिन्यूएबल एनर्जी मैन्युफैक्चरिंग में बैटरी स्टोरेज के लिए रॉ मटेरियल्स पर जीरो ड्यूटी से लोकल प्रोडक्शन बढ़ सकता है। इसी तरह, टेक्सटाइल सेक्टर में मैन-मेड फाइबर्स पर GST रैशनलाइजेशन से एक्सपोर्ट्स को बूस्ट मिलेगा। एमएसएमई एसोसिएशंस की मांग है कि एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन के तहत 25,060 करोड़ रुपये की स्कीम को और मजबूत किया जाए।
फाइनेंस के क्षेत्र में, एमएसएमई को ट्रस्ट-बेस्ड लेंडिंग की ओर शिफ्ट करने की जरूरत है। वर्तमान में, कोर्सिव प्रोविजंस से बायर्स को 45 दिन में पेमेंट करने के लिए मजबूर किया जाता है, लेकिन इंफोर्समेंट कमजोर है। अगर पब्लिक प्रोक्योरमेंट नॉर्म्स में टाइमली पेमेंट को इंसेंटिवाइज किया जाए, तो लार्ज बायर्स की पेमेंट डिसिप्लिन सुधरेगी। साथ ही, NBFCs के थ्रू MSME क्रेडिट को प्रायोरिटी सेक्टर में शामिल करने से फ्लो बढ़ेगा।
सरकारी खरीद में सुधार के लिए, एमएसएमई को प्रोटेक्शन अगेंस्ट एक्सचेंज-रेट वोलेटिलिटी और टैरिफ शॉक्स की जरूरत है। एसोसिएशन ऑफ इंडियन एंटरप्रेन्योर्स ने 1 करोड़ रुपये तक के माइक्रो एंटरप्राइजेज के लिए स्टेट्यूटरी कोलेटरल-फ्री लोन और 6-7 प्रतिशत इंटरेस्ट कैप की मांग की है। साथ ही, एक्सपोर्ट रिस्क इक्वलाइजेशन फंड और टेम्परेरी ड्यूटी ड्रॉबैक एन्हांसमेंट से ग्लोबल अनिश्चितताओं से निपटा जा सकता है।
एमएसएमई सुधार के प्रमुख सुझाव
रॉ मटेरियल एक्सेस: क्रिटिकल इनपुट्स पर कस्टम ड्यूटी रैशनलाइजेशन और सब्सिडी @35 % ऑन प्राइम कॉस्ट।
फाइनेंस सपोर्ट: क्रेडिट गारंटी मैकेनिज्म्स का विस्तार, इंटरेस्ट सबवेंशन 2.75% तक, और डेडिकेटेड फंड फॉर अनरेटेड कंपनियां।
पेमेंट इंप्रूवमेंट: 45-डे मैंडेट का सख्त इंफोर्समेंट, पब्लिक प्रोक्योरमेंट में टाइमली पेमेंट को इंसेंटिव।
इंफ्रास्ट्रक्चर: लॉजिस्टिक्स कॉस्ट रिडक्शन और इंडस्ट्रियल इंफ्रा फॉर एमएसएमई।
टैक्स रिलीफ: कनसेसनल टैक्स रिजीम्स का एक्सटेंशन और GST रैशनलाइजेशन ऑन मैन-मेड फाइबर्स।
इन सुधारों से एमएसएमई की कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ेगी, जो देश की सप्लाई चेन को मजबूत करेगी। चीन के मुकाबले भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए, लॉजिस्टिक्स कॉस्ट को 14 प्रतिशत से घटाकर 8 प्रतिशत करना जरूरी है। साथ ही, डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन के लिए AI, क्लाउड सर्विसेज और साइबरसिक्योरिटी पर इंसेंटिव्स से सेक्टर अपग्रेड हो सकता है।
एमएसएमई की ग्रोथ के लिए, गवर्नमेंट को स्कीम्स के इम्प्लिमेंटेशन में साइलोज को तोड़ना होगा। स्टेकहोल्डर्स की कंसल्टेशंस से पता चलता है कि ओवरलैपिंग स्कीम्स से डुप्लिकेशन होता है, जिससे बेनिफिशियरी आउटरीच कम हो जाती है। कन्वर्जेंस से इफिशिएंसी बढ़ेगी और इम्पैक्ट मजबूत होगा।
अंत में, बजट 2026 में इन मुद्दों पर फोकस से एमएसएमई सेक्टर न केवल सर्वाइव करेगा बल्कि थ्राइव करेगा, जो अर्थव्यवस्था की बैकबोन को मजबूत करेगा।
Disclaimer: यह रिपोर्ट समाचार, रिपोर्ट्स और टिप्स पर आधारित है। स्रोतों की सटीकता की गारंटी नहीं दी जाती।










